मौत की ओर धकेली जा रही एक नदी जो कभी जीवन से भरी थी

वरुणा की हालत देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का दिल रो उठेगा. एक तो पानी की कमी से उसका पेटा इतना सिकुड़ चुका है कि अब वह नदी से अधिक एक नाले जैसी हो गई है. दूसरे जगह-जगह से उसमें आकर गिरते जहरीले और गंदे नाले जो उसके पानी और जीवन को नरक बना रहे हैं. बदबू का आलम यह है कि कहीं-कहीं तो नाक पर रुमाल रखना पड़ता है. फिर भी कहीं धोबी कपडे धोते तो कहीं लोग दतुअन करके मुंह धोते और नहाते भी दिख जाते हैं. जो लोग अब इसके पानी को छूना नहीं चाहते हैं यह सब देखकर उनका मन गिनगिना उठता है. सबसे बड़ी बात है कि अब नदी के पानी में कोई जलीय जंतु मुश्किल से दीखता है. मछलियाँ कहीं उछलते कूदते नहीं मिलतीं. कहीं कछुए तैरते नहीं दीखते और न ही डेड़हे भागते दीखते हैं न बगुले ध्यान लगाये. जलकुम्भी जरूर यहाँ-वहां दिखती है लेकिन सेवार या जलमोथा जैसी कोई बनस्पति नहीं रह गई है और न ही घोंघा-सुतुही या मेंढक का नामोनिशान है. इस प्रकार जो वरुणा आज दिखाई देती है उसकी जैव-विविधता विलुप्त हो चुकी है.
लेकिन अपनी यात्राओं में ऐसे तमाम लोगों से मिलते और बात करते हैं जिनकी उम्र चालीस-पचास के ऊपर नीचे है और उनकी यादों में इस नदी का एक लहलहाता चित्र है. नदी के बारे में बात करते हुए उनकी आँखों में एक चमक उभर आती है. वे जब बताते हैं कि एक समय में इस नदी में न केवल खूब तैरते थे बल्कि घरों में खाना बनाने के लिए भी इसका पानी ले जाया जाता था तब अचरज ज्यादा होता भरोसा कम ही होता लेकिन यह कोई गलत तथ्य नहीं है. मुश्किल से पच्चीस-तीस वर्ष पीछे की बात है जब वरुणा वास्तव में एक निर्मल नीर की नदी थी. जाड़े में वह हरे हरे सेवार से भरी होती जिसे किनारे के गाँवों के पशुपालक निकाल कर अपने मवेशियों के चारे के लिए ले जाते. यह अनुभव एक-दो लोगों का नहीं है बल्कि अपनी यात्रा के समय हमने सैकड़ों स्त्री-पुरुषों से यह सवाल किया और अमूमन सबके अनुभव एक जैसे ही थे. यह नहीं कहा जा सकता कि सुदूर अनेई और दानियालपुर के लोग एक ही जैसा रटा-रटाया उत्तर देंगे. जब तक कि उनके अनुभव के घटक समान न हों. इसका मतलब है कि बीते दो-ढाई दशक वरुणा के लिए काफी भयावह रहे हैं. इसी समय में यह देखना होगा कि वे कौन से राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारण रहे हैं जिनकी वजह से इसका यह हाल हुआ है.
ग्राम चमांव के एक किसान और लोकगायक श्यामजीत का कहना था कि केवल नदी ही नहीं मरी है बल्कि इनसान भी मर गया है. इनसान के दूर होने से नदी मरी और नदी से दूर होकर इन्सान भी मरा है. बेशक यह एक भाववादी वाक्य हो लेकिन लेकिन इसमें अन्तर्निहित सचाई कई बुनियादी घटकों से बनी है. वास्तव में नदियाँ वही जीवित रहती हैं जिनसे वहां के लोगों का जुड़ाव होता है. और यह एक कड़वा सच है कि नदियों से रिश्ता लगातार क्षीण हुआ है. यहाँ तक कि जो नदियाँ लोगों की धार्मिक श्रद्धा का केंद्र हैं वे भी लगातार जीवन-मरण के बीच झूल रही हैं.
वरुणा के बारे में लोगों की अच्छी स्मृतियाँ भूमंडलीकरण के पहले तक हैं. उसके बाद सब कुछ खुले विश्व व्यापार के हवाले है. इस नदी के पानी को बाद में कस्बों और शहरों के सीवर, होटलों के मल और औद्योगिक कचरे ने ज़हर से भर दिया. बनारस में वरुणा बीस-बाइस किलोमीटर के दायरे में पूरी तरह नारकीय स्थिति में पहुँच चुकी है. कोई परियोजना नहीं है कि इसका पानी किस तरह साफ किया जाय और लगातार साफ़ रखा जाय.
वरुणा के कैचमेंट एरिया के तालाब या तो पट चुके हैं या अतिक्रमण के शिकार हो चुके हैं. वरुणा स्वयं अतिक्रमण का शिकार है. परिणाम क्या है? पानी का लेवल लगातार नीचे होता गया है. उपरी सतहों पर पानी में सीसा, आर्सेनिक जैसे ज़हरीले तत्व रिस रहे हैं और यह सब अंततः किसी न किसी रूप में मानव शरीर तक पहुँच रही है.
एक बिलकुल उदासीन हो चुके माहौल में ‘गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट’ की पहलकदमी सबसे पहले लोगों को संवेदनशील बनाने के लिए वरुणा के किनारों की पदयात्रा करना, वहां के लोगों को भी इससे जोड़ना, बातचीत और गोष्ठियां करना तथा एक व्यापक सर्वेक्षण करना है. इस सर्वेक्षण के विविध आयाम है. वरुणा का किनारे के जीवन में उपस्थिति और महत्व जानना, उसकी जैव विविधताओं की खोज और पुर्स्थापन करना, उसके आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं का गहराई से विश्लेषण करना, उससे जुड़े हर सांस्कृतिक घटक की शिनाख्त और संयोजन करना सबकुछ एक क्रमिक कार्यभार है.
ट्रस्ट कि कोशिश अधिकतम लोगों को इस इसमें शामिल करना है. वे महिलाएं जो इसके किनारों पर आज भी खेती करती हैं अथवा अपने मवेशियों के लिए घास-चारा जुटाते हुए मिल जाती हैं या वे किसान जो इसके पानी के बिना खेती की सिंचाई करना सोच भी नहीं पाते अथवा वे दलित समुदाय जो आज भी कहीं न कहीं इसमें से मछली पकड़ने के लिए बंशी लगाये या जाल लिए दिख जाते हैं सभी इस अभियान के हिस्से हैं. तमाम लोककलाकार, दस्तकार और शिल्पी उस सैकड़ों गाँवों में आज भी बसते हैं जिनकी शक्लें भूमंडलीकरण ने बदल दी है लेकिन उनके पास आज भी अपना हुनर सुरक्षित है. उन्हें मौका मिलने की देर है. उसके बाद एक नया दौर शुरू होगा.
आगे हमारी कोशिश यह है कि सम्बंधित प्रशासनिक इकाइयों को इन सबसे अवगत कराया जाय तथा इसमें गिरने वाले मल-जल शोधन तथा कूड़ा निस्तारण और प्रबंधन के लिए स्थायी उपाय किया जा सके. नदी के कैचमेंट एरिया में आनेवाले तालाबों और पोखरियों का पुनरुद्धार किया जा सके. जलीय जंतुओं और वनस्पतियों को फिर से
हमें उम्मीद है कि एक दिन वरुणा हमारी अपेक्षाओं से ज्यादा लहराती हुई जीवन को समृद्ध करेगी!