झोला पुस्तकालय
गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट पूर्वान्चल के 15 जिलों में ‘कबीर-रैदास झोला पुस्तकालय’, ‘जोतिबा-सावित्रीबाई झोला पुस्तकालय’, ‘डॉ अम्बेडकर-पेरियार झोला पुस्तकालय’, ‘ललई-रामस्वरूप-जगदेव झोला पुस्तकालय’ और ‘बीपी-मंडल-वीपी सिंह झोला पुस्तकालय’ की एक लम्बी श्रृंखला स्थापित कर रहा है. इस क्रम में और भी बहुजन नायकों के नाम से पुस्तकालय बनाये जायेंगे. ट्रस्ट का लक्ष्य अगले दस वर्षों में पूर्वांचल के प्रत्येक गाँव में एक स्वतंत्र झोला पुस्तकालय स्थापित करने तथा लोगों तक ज्ञान-विज्ञानं, साहित्य, इतिहास और संस्कृति की पुस्तकों को पहुँचाना है. लोगों को शिक्षित और वैज्ञानिक चेतना संपन्न बनाना ट्रस्ट का सबसे बड़ा लक्ष्य है. हर साल झोला पुस्तकालयों में नई-नई पुस्तकें शामिल की जाएँगी. इसके साथ ही श्रमजीवी स्त्री-पुरुषों, बच्चों-बुजुर्गों की आत्माभिव्यक्ति के विकास के लिए नियमित पुस्तक-पाठ, बातचीत और कार्यशालाएं आयोजित किये जायेंगे. आप इस मुहिम में एक या एकाधिक झोला पुस्तकालयों के लिए आर्थिक सहयोग दे सकते हैं.
स्वास्थ्य शिविर तथा दवा वितरण
गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट ‘अच्छा स्वास्थ्य सबका अधिकार’ मुहिम के अंतर्गत नियमित रूप से स्वास्थ्य शिविर का आयोजन करता है. यह एक व्यापक आयोजन है जिसका लाभ किसी एक गाँव के लोग नहीं बल्कि अलग-अलग गाँवों के लोगों द्वारा उठाया जाता है. स्वास्थ्य शिविर में विभिन्न रोगों के विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल होते हैं. स्वास्थ्य शिविर ऐसे स्थान पर आयोजित किया जाता है जिसमें अधिक से अधिक लोग आसानी से पहुँच सकें. इस प्रकार विशेषज्ञ चिकित्सकों के परामर्श और चिकित्सा से ज्यादा से ज्यादा ग्रामीण जनता को लाभ मिलता है और क्रमिक रूप से अधिक से अधिक गाँवों तक चिकित्सकों की पहुँच संभव हो पा रही है. ‘गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट’ ने जनसेवा को समर्पित ऐसे डॉक्टरों की टीम बनाई है. स्वास्थ्य शिविर में न सिर्फ स्वास्थ्य जाँच का कार्यक्रम चलता है बल्कि स्वास्थ्य जागरूकता तथा एक भारतीय नागरिक के तौर पर अपने स्वास्थ्य-अधिकारों को लेकर विचार-विमर्श भी होता है. शिविर में गरीब और अक्षम मरीजों को निःशुल्क दवाएं भी वितरित की जाती हैं. आप इस मुहिम के लिए आर्थिक अथवा दवाओं के रूप में सहयोग दे सकते हैं.
शिक्षा
दुनिया में स्कूलों के बहुत प्रकार हैं और उनकी खूबियाँ भी बहुत होंगी. एक से एक ऊँचे और महंगे स्कूल जहाँ पढ़ाने के लिए अभिभावक अपनी तिजोरी के मुंह खोल देते हैं. बहुत से ऐसे जिनकी तिजोरी कमतर है तो वे थोडा समझौता कर लेते हैं और बाकि सब बच्चों की मेधा पर छोड़ देते हैं. बाकियों में ऐसा कुछ नहीं होता तो वे सरकारी स्कूलों के भरोसे बच्चों के भविष्य का सपना देखते हैं और बेशक उनमें से हजारों बच्चे इतने प्रतिभावान होते हैं कि दांतों तले ऊँगली दबानी पड़ती है. लेकिन हालिया वर्षों में नंबर का जो पागलपन स्कूली शिक्षा पर सवार हुआ है उसने इस बात को लगभग विस्मृत ही कर दिया कि पढ़-लिखकर, पैसा कमाकर एक संपन्न और सुखी जीवन हासिल कर भी वास्तव में विद्यार्थियों ने किन इन्सानी ऊँचाइयों को छुआ है? कहीं वे पूंजीवादी रोबोट में तो नहीं बदल गए हैं!
इसलिए हमारे मन में हमेशा एक साध रही कि एक ऐसा स्कूल बनाया जाय जो कई ऐसी सीमाओं का अतिक्रमण करे जो पूंजीवादी शिक्षा पद्धति ने अपने लिए रूढ़ कर लिया है. बल्कि यह स्कूल अपनी तरह का आप हो. छोटे बच्चे यहाँ आएँ तो खेले और आपस में किस्से-कहानियाँ कहें-सुनें और हम खुद देखें कि उनके मनोलोक में यह संसार कैसा है? यहाँ बच्चे बेखटके और मन भर खेलें और वे काम करें जो उनको अच्छा लगता है. होमवर्क के दबाव से दूर वे अपने भीतर की प्रतिभा को निखार सकें. जो बच्चे कभी पारिवारिक या आर्थिक-सामाजिक कारणों से स्कूल तक नहीं जा सके वे भी बेखटके यहाँ आएँ और इसका हिस्सा बन जाएँ. वे अक्षरों और वाक्यों के मार्ग से भाषा के पुलों से फलांगते किताबों की दुनिया में दूर तक की यात्रा कर आएँ. यहाँ तक कि वे यह जान सकें कि उनके जीवन की बहुत सी कहानियां इन किताबों में लिखी हैं लेकिन अनगिनत हैं जिन्हें वे कहेंगे तो और अच्छी किताबें बनेंगी.
वरुणा विद्यालय की कल्पना एक प्यारी नदी के साथ-साथ चलते हुए हुई और यह उसके किनारे के गाँवों में एक अनौपचारिक पहलकदमी बन रहा है. आगामी वर्षों में यह एक लम्बी श्रृंखला हो सकती है. इस विद्यालय के सञ्चालन के पीछे हमारा विचार है कि ‘प्रकृति ने हर व्यक्ति को प्रतिभा दी है. सच्चा अध्यापक उसे पहचान देता है.’
वरुणा विद्यालय एक सुदृढ़ दिल-दिमाग और विवेक संपन्न विद्यार्थी तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है जिन्हें आगे की पढाई के लिए उपयुक्त विद्यालयों और संस्थानों में भेजा जायेगा.
मीडिया
हम लोगों ने 16 मार्च 2016 को गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट की स्थापना की और उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के एक गाँव से अपने काम की शुरुआत की. हमारा काम इस मायने में दूसरों से थोड़ा अलग था कि किसी बने-बनाये खांचे के अनुरूप हमने कार्य नहीं शुरु किया और न ही किसी किस्म ऐसा कोई दावा किया कि हम ग़रीबी हटाने या जनकल्याण करने जा रहे हैं. बल्कि हम मानते हैं कि हजारों साल से चली आ रही मनुष्यता के बीच पैदा हो गई विषमता और विचलन के कारण बढती हुई खाई के बुनियादी कारणों की खोज करते हुए हम लोगों के बीच मौजूद ऐसे सूत्रों को पकड़ेंगे जिससे वे इस दुनिया को सुन्दर और बेहतरीन रहवास बना सकें. इस क्रम में हमने मनुष्य को प्राथमिक स्तर पर प्रभावित करने वाले कुछ मुद्दों को अपने काम केंद्र बनाया.
हमने उसी वर्ष से एक द्वैमासिक पत्रिका गाँव के लोग का प्रकाशन भी शुरू किया जो पिछले छः वर्ष से लगातार निकल रही है । अब तक इसके कुल 27 अंक निकल चुके हैं। जब हमने गाँव के लोग नामक पत्रिका के प्रकाशन की योजना बनाई तो इसी बात को केंद्रीय जगह दी तथा दश में चल रहे जनांदोलनों और जनता के सवालों को अत्यंत महत्व के साथ उन लोगों तक पहुँचाने की कोशिश की जाय जो स्वयं सामाजिक अन्याय के खिलाफ लगातार लड़ रहे हैं। इस पत्रिका का उद्देश्य गावों-जंगलों-पहाड़ों के बीच हो रहे संघर्षों को व्यापक मानवीय समाज के संघर्षों से जोड़ना है। प्रकृति और पर्यावरण के विनाश और मुट्ठी भर कॉर्पोरेट-हिंस्र-पशुओं द्वारा सम्पूर्ण मनुष्यता को शोषण और पतन के गर्त में धकेलने की साजिश के साथ ही ब्राह्मणवादी सोच और व्यवहार के माध्यम से मनुष्यों के बीच ऊंच-नीच की खाई बनानेवाले मनुवादी वायरसों के खिलाफ ‘गाँव के लोग’ आज एक जन जागरण अभियान है।
कहना जरूरी है कि यह हिन्दी की अकेला ऐसा मंच है जिसने धार्मिक फासीवाद और कॉर्पोरेटपरस्त एवं जनविरोधी नीतियों की मुखर आलोचना की है। बिना डरे पूरे साहस के साथ गाँव के लोग ने किसानों, मजदूरों , स्त्रियों, बच्चों, आदिवासियों, पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की वकालत तो की ही है। कॉर्पोरेट लूट, अपराधीकरण, जबरन भू-अर्जन, जंगलों की कटाई, नदियों की चोरी और पहाड़ों के अवैध खनन तथा पर्यावरण विनाश के खिलाफ इस गाँव के लोग ने जनता की हर आवाज को तरजीह और ऊंचाई भी दी है। हम दूर-दराज से ग्राउंड-रिपोर्टिंग करते हुये मुद्दों और सवालों की तह में गए हैं। इसके अलावा हमने अपसंस्कृति के विरुद्ध जनसंस्कृति की तलाश , शोध और परिमार्जन को भी अपना महत्वपूर्ण लक्ष्य बनाते हुये विभिन्न संस्कृति रूपों, लोककलाओं और उनसे जुड़े लोगों का दस्तावेजीकरण-प्रकाशन, ग्रामीण शालाओं में बेहतरीन काम करने वाले अध्यापकों के कामों का मूल्यांकन तथा समाजों के बूढ़-पुरनियाँ लोगों की स्मृतियों से मौखिक इतिहास का संयोजन भी जारी रखा है। इन्हीं कामों और स्वाभाविक निर्भीकता एवं साहस के कारण गाँव के लोग को बहुत से लोगों ने अपने दिल के करीब रखा और हरसंभव सहयोग दिया है।
24 जून 2021 को कबीर जयंती के मौके पर गाँव के लोग वेबसाइट लांच हुई. यह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एक वेबसाइट है. इसको www.gaonkelog.com पर देखा जा सकता है.